शाम ढल रही थी,
हाथ में चाय की
गरम प्याली थी और पास में ही मेरी धर्मपत्नी बैठी थीं। तभी मेरी नन्हीं बेटी अनिका
मेरे पास आकर बैठ गई। अचानक वह बड़े ही मासूम
मगर गंभीर अंदाज़ में बोली—
"पापा, स्कूल में सारे बच्चे बड़े होकर कुछ न कुछ बनना चाहते हैं... कोई डॉक्टर, कोई IAS, कोई इंजीनियर तो कोई आर्टिस्ट। पापा, मुझे एडवोकेट (वकील) के बारे मे जानना है। जैसे एक डॉक्टर का फर्ज़ होता है कि वह हर मरीज़ का इलाज करे—चाहे वह अच्छा इंसान हो या बुरा—क्या वैसे ही वकीलों के लिए भी कोई कड़े नियम, पाबंदियाँ या ज़िम्मेदारियाँ होती हैं?"
मैंने चाय का कप
मेज़ पर रखा दिया। चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई, मगर मन में उसके इस विचारशील सवाल के
प्रति उतनी ही गंभीरता थी।
मैंने अनिका के
सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "हाँ बेटी, बिल्कुल होता है। वकालत सिर्फ एक पेशा
नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की रीढ़ है। एक वकील अदालत का सिपाही (Officer of
the Court) होता है। जिस तरह डॉक्टरों की शपथ होती है, उसी तरह 'बार काउंसिल ऑफ इंडिया' और हमारे कानूनों
ने वकीलों के लिए भी बेहद कड़े और रोचक नियम तय किए हैं। चलो, आज तुम्हें वकालत
की दुनिया के कुछ ऐसे अनकहे नियम बताता हूँ, जो शायद बहुत कम लोग जानते हैं।"
अनिका और उसकी
मम्मी दोनों बड़े ध्यान से सुनने लगीं।
1. मुवक्किल को मना न करने का नियम जिसे हम 'कैब-रैंक रूल' कहते हैं।
"बेटी, तुमने बिल्कुल सही
मिसाल दी। जैसे टैक्सी स्टैंड पर खड़ी पहली टैक्सी किसी भी सवारी को ले जाने से
बिना ठोस वजह के मना नहीं कर सकती, ठीक उसी तरह एक वकील भी किसी का केस लेने से सिर्फ इसलिए
मना नहीं कर सकता कि वह इंसान समाज में बदनाम है या उस पर बहुत संगीन आरोप लगे
हैं। कानून का मानना है कि हर व्यक्ति को अपनी बात रखने और निष्पक्ष सुनवाई (Fair
Trial) का हक है। जब तक
कोई बहुत जायज वजह न हो, एक वकील मुवक्किल को लौटा नहीं सकता।"
2. वकालत कोई दुकान नहीं है इसलिए विज्ञापन पर पूरी रोक होती है।
"तुमने टीवी पर
साबुन, गाड़ियों और कपड़ों के इश्तेहार तो बहुत देखे होंगे, पर क्या कभी किसी वकील का विज्ञापन देखा
है कि 'हमारे यहाँ सबसे सस्ता और पक्का केस लड़ा जाता है'? बिल्कुल नहीं! कानूनन एक वकील अपने नाम
या काम का व्यावसायिक प्रचार (Advertisement) नहीं कर सकता। वह यह नहीं कह सकता कि 'मैं शहर का नंबर 1
वकील हूँ' या 'मेरे पास 99%
केस जीतने का
रिकॉर्ड है'। यहाँ तक कि उनकी वेबसाइटें भी सिर्फ कानूनी जानकारी देने के लिए होती हैं,
ग्राहकों को
लुभाने के लिए नहीं।"
3. केस जीतने पर हिस्सेदारी या कमीशन का कोई खेल नहीं होता है।
"एक डॉक्टर कभी यह
नहीं कहता कि 'मरीज़ बच गया तो उसकी आधी जायदाद मेरी।' ठीक वैसे ही, एक वकील अपने मुवक्किल के साथ यह समझौता
कभी नहीं कर सकता कि 'अगर मैंने तुम्हें 50 लाख का मुआवज़ा या ज़मीन का मुकदमा जिता दिया, तो उसमें से 10%
या 20% हिस्सा मेरा होगा।'
इसे कानून में 'Contingency
Fee' कहते हैं, जो भारत में पूरी
तरह गैर-कानूनी है। वकील सिर्फ अपनी तय कानूनी मेहनत की फीस ले सकता है, केस के फैसले से
उसका निजी वित्तीय मुनाफा नहीं जुड़ सकता।"
4. एक वकील , मुवक्किल की फाइल या कागज़ात बंधक नहीं बना सकता है।
"अगर कभी किसी
मुवक्किल के पास पैसे की तंगी हो और वह वकील की पूरी फीस न दे पाए, तब भी वकील उसके
केस की मूल फाइल या ज़रूरी दस्तावेज़ अपने पास रोककर (बंधक बनाकर) नहीं रख सकता।
देश की सबसे बड़ी अदालत का साफ़ निर्देश है कि केस के कागज़ात मुवक्किल की अमानत
होते हैं। फीस का विवाद अलग बात है, मगर उसके कागज़ात रोककर उसका केस खराब करना भारी कदाचार
माना जाता है।"
5. विवादित संपत्ति को खुद नहीं खरीद सकता है।
"जिस ज़मीन,
मकान या जायदाद को
लेकर अदालत में मुकदमा चल रहा हो, उस केस को लड़ने वाला वकील उस संपत्ति को न तो खुद खरीद
सकता है और न ही अपने परिवार के किसी सदस्य के नाम पर ले सकता है। ऐसा इसलिए ताकि
कोई भी वकील अपने मुवक्किल की कानूनी उलझनों या लाचारी का निजी फायदा न उठा
सके।"
6. सफेद नेकबैंड का गहरा रहस्य
"तुमने वकीलों के
गले में जो सफेद पट्टी (बैंड) लटकी देखी है, उसके पीछे सदियों पुराना इतिहास है। वह
सफेद नेकबैंड कानून की दो तख्तियों का प्रतीक है—एक तरफ 'संसार का नागरिक कानून' और दूसरी तरफ 'ईश्वरीय व नैतिक
कानून'। यह बैंड वकील को हर पल याद दिलाता है कि उसे सच, न्याय और नैतिकता के दोनों पलड़ों को
हमेशा बराबर रखना है।"
7. फुल-टाइम नौकरी या एक्टिव बिज़नेस की मनाही होती है।
"एक प्रैक्टिसिंग
वकील किसी कंपनी, स्कूल या दफ्तर में महीने की तनख्वाह पर फुल-टाइम नौकरी नहीं कर
सकता। न ही वह किसी दुकान या सक्रिय व्यापार का सीधा मैनेजमेंट संभाल सकता है।
वकालत पूरी निष्ठा और पूर्णकालिक समर्पण मांगती है। अगर किसी को दूसरा काम करना है,
तो पहले अपनी
वकालत का लाइसेंस (सनद) सरेंडर करना पड़ता है।"
8. अदालत में 'माय लॉर्ड' कहना कोई मजबूरी नहीं
"अक्सर फिल्मों में
देखते हैं कि वकील हाथ जोड़कर 'माय लॉर्ड' कहते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि अंग्रेजों के ज़माने के इस
शब्द को कहने की अब कोई बाध्यता नहीं है। वकील जजों को बहुत ही सम्मान के साथ 'Sir',
'Your Honour' या हिंदी में सीधे 'श्रीमन्' कहकर अपनी बात रख सकते हैं।"
9. मुवक्किल का भरोसा सबसे बड़ा कवच होता है।
"एक मुवक्किल अपने
वकील को अपने जीवन का सबसे बड़ा राज़ भी बता दे, तो पुलिस या अदालत भी उस वकील को वह राज़
उगलने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। इसे 'Privileged Communication' कहते हैं।
मुवक्किल का विश्वास वकील के पास सबसे सुरक्षित अमानत होता है।"
मेरी बातें सुनकर
अनिका ने चाय की आख़िरी घूंट ले रही अपनी मम्मी की तरफ देखा और फिर मुस्कुराते हुए
मुझसे बोली, "पापा, इसका मतलब है कि एक सच्चा वकील वही है जो सिर्फ कानून की
किताबें न रटे, बल्कि अपने उसूलों और न्याय की मर्यादा पर भी उतना ही अडिग
रहे!"
उसकी इस बात ने
दिल छू लिया। मैंने मुस्कुराकर कहा, "बिल्कुल अनिका! वकालत कोई व्यापार नहीं,
इंसाफ के तराजू को
हमेशा सीधा रखने की एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है।"