बेटी आज तुम बहूत छोटी हो लेकिन जब तुम बारी होगी तो यह लेख तुमको आज के समाज के बारे मे बताएगा और तुम्हें अपने जीवन मे सही निर्णय लेने मे मदद करेगा । बेटी आज तुम अपनी माँ की गोदी में मुस्कुराती हो, पापा की उंगली पकड़ती हो और दुनिया के स्वार्थ, संघर्षों और सामाजिक बंधनों से बिल्कुल बेफ़िक्र हो। लेकिन जैसे-जैसे तुम बड़ी होगी, तुम्हारी आँखें अपने आसपास के माहौल को देखेंगी और तुम्हारा दिमाग इस समाज को समझने की कोशिश करेगा। यह लेख कुल 4 भागों मे है।
इस पहले भाग में, मैं तुम्हें यह बताना चाहता हूँ कि तुम जिस घर में पल-बढ़ रही हो, वह कैसा है और जब तुम इस घर की दहलीज पार कर बाहर की दुनिया में देखोगी, तो वहाँ की ज़मीनी हकीकत कैसी होगी।
1 तुम्हारा अपना घर: जहाँ 'आदर्श' ही सामान्य है
अनिका, तुम बहुत भाग्यशाली हो कि तुमने एक ऐसे घर में जन्म लिया है जहाँ तुम्हारे माता-पिता कागज़ी समानता पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक साझेदारी पर विश्वास करते हैं।
तुम अपनी आँखों से देखोगी कि तुम्हारे पापा, रसोई में तुम्हारी माँ के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं, कई बार माँ से अधिक समय किचन में बिताते हैं, कपड़े धोते हैं, और जब तुम्हारी माँ अपनी पढ़ाई और करियर की तैयारी करती हैं, तो पापा तुम्हार पालन-पोषण की हर ज़िम्मेदारी सहर्ष निभाते हैं।
हमारे घर में काम का बंटवारा इस आधार पर नहीं होता कि कौन स्त्री है और कौन पुरुष; बल्कि इस आधार पर होता है कि इस समय परिवार के लिए सबसे ज़रूरी क्या है। तुम्हारे लिए यही 'नॉर्मल' (सामान्य) जीवन होगा।
2 बाहर का भारतीय समाज: एक कड़वी हकीकत
जब तुम बड़ी होकर समाज को देखोगी, तो तुम्हें एक बहुत बड़ा 'सांस्कृतिक झटका' लग सकता है। तुम्हें समझ आएगा कि जैसा तुम्हारा अपना घर है, वैसा बाहर का भारतीय समाज अभी पूरी तरह से नहीं बन पाया है।
पारंपरिक रूढ़िवादिता: आज भी भारत के अधिकांश घरों में लड़कियों को पढ़ाई-लिखाई से ज़्यादा इस बात के लिए तैयार किया जाता है कि वे किचन के काम में कितनी निपुण हैं। समाज यह मानकर चलता है कि लड़की चाहे कितनी भी बड़ी अफ़सर बन जाए, अंततः घर संभालना और 'चौका-बर्तन' करना सिर्फ उसी की डिफ़ॉल्ट ड्यूटी (Default Duty) है।
पुरुषों पर आर्थिक बोझ: दूसरी तरफ, इस समाज ने पुरुषों के पैरों में भी एक अदृश्य बेड़ी बांधी है। यदि कोई पुरुष आर्थिक रूप से कमज़ोर हो या नौकरी छोड़कर घर संभालना चाहे, तो यह समाज उसे स्वीकार नहीं करता। पुरुषों पर 'हमेशा कमाते रहने और परिवार का आर्थिक बोझ उठाने' का भयंकर मानसिक तनाव होता है।
बदलती न्यूक्लियर फैमिली का नया जाल: आज के दौर में हस्बैंड-वाइफ दोनों नौकरी तो करने लगे हैं, लेकिन घर लौटकर घरेलू काम का अधिकांश बोझ (जिसे समाजशास्त्र में 'द सेकंड शिफ्ट' कहा जाता है) आज भी चुपचाप महिलाओं के हिस्से ही आ जाता है।
3 सही क्या है? और आने वाला समय कैसा होना चाहिए?
मेरी बच्ची, तुम हमेशा याद रखना कि जो समाज में 'चल रहा है', ज़रूरी नहीं कि वही 'सही' हो। सही क्या है, इसके लिए पापा तुम्हें दो मूल मंत्र दे रहे हैं:
पूरकता का सिद्धांत (Complementarity): स्त्री और पुरुष प्रकृति के स्तर पर एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी (Competitors) नहीं, बल्कि पूरक हैं। प्रकृति ने दोनों को अलग क्षमताएं दी हैं। असली समानता यह नहीं है कि हम प्रकृति के नियमों को बदल दें (जैसे बच्चे को जन्म देने का काम सिर्फ महिला ही कर सकती है)। असली समानता यह है कि जब महिला समाज या प्रकृति के कारण कोई कठिन ज़िम्मेदारी निभा रही हो, तो पुरुष घरेलू और सामाजिक मोर्चों पर उसका सहारा बने।
हुनर का जेंडर से कोई वास्ता नहीं: खाना बनाना, घर की सफाई करना या अपने कपड़े धोना—यह किसी एक जेंडर (लड़की या लड़के) का कर्तव्य नहीं है। यह 'लाइफ स्किल' (जीवन जीने की कला) है। जैसे जीवित रहने के लिए सांस लेना और पानी पीना ज़रूरी है, वैसे ही हर इंसान को अपना पेट पालने के लिए बुनियादी खाना बनाना और खुद को संभालना आना ही चाहिए।
भाग - 2
इस भाग में पापा और उनके एक सहयोगी (AI) के बीच हुई गहन और व्यावहारिक चर्चा हुई, ताकि अनिका यह समझ सके कि जीवन को केवल एक चश्मे से नहीं, बल्कि हर पहलू से तौलकर देखना क्यों ज़रूरी है।
हमारी वैचारिक बहस: दो सोच और जीवन का तराजू
बेटी, जब तुम सोचने और समझने के काबिल होगी, तब तुम्हें समझ आएगा कि दुनिया में किसी भी विषय पर केवल एक विचार सही नहीं होता। इस दूसरे भाग में, मैं तुम्हें समाज की दो अलग-अलग विचारधाराओं के बीच हुई एक बहुत बड़ी बहस का सारांश सौंप रहा हूँ। यह बहस तुम्हारे पापा और उनके एक डिजिटल सहयोगी के बीच हुई, जिसका केंद्र बिंदु 'तुम्हारी परवरिश और तुम्हारा भविष्य' था।
इस चर्चा की शुरुआत समाज के एक दूसरे परिवार की कहानी से हुई थी। आइए, इस पूरी बहस के मुख्य पड़ावों को विस्तार से समझते हैं:
1 पहली सोच: 'रणनीतिक बहिष्कार' का नज़रिया (The Rebel View)
हमारे समाज में एक ऐसा परिवार भी है जहाँ माँ मुख्य रूप से आर्थिक जरूरत को पूरा करती है। लेकिन उस माँ की अपनी बेटी के लिए एक खास सोच है—वे अपनी बेटी को किचन या घर के काम सीखने से साफ़ मना करती हैं। उनका तर्क है: "मेरी बेटी बड़ी होकर इतना पैसा कमा लेंगी कि इस काम के लिए नौकर या स्टाफ रख सकें।"
इस सोच के पीछे कुछ गहरे और सुरक्षात्मक कारण थे:
रूढ़िवादिता पर सीधा प्रहार: वह माँ चाहती है कि उसकी बेटियां बचपन से इस पारंपरिक जाल में न फंसें कि 'लड़की है तो चौका-बर्तन ही उसकी नियति है।'
उच्च महत्वाकांक्षा: वह अपनी बेटियों को केवल साधारण नौकरी के लिए नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट जगत या समाज के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचने के लिए प्रेरित कर रही है।
'द सेकंड शिफ्ट' का डर: आज के न्यूक्लियर परिवारों में (जहाँ पति-पत्नी अकेले रहते हैं) अक्सर यह देखा जाता है कि दोनों के नौकरीपेशा होने के बावजूद, ऑफिस से लौटकर घर का काम 'डिफ़ॉल्ट रूप से' पत्नी के हिस्से आ जाता है। वह माँ अपनी बेटी को इस अदृश्य जाल से बचाना चाहती है—"जब काम आएगा ही नहीं, तो कोई उम्मीद भी नहीं करेगा।"
2 दूसरी सोच: तुम्हारे पापा का 'यथार्थवादी' प्रतिवाद (The Realistic Counter)
एक शिक्षक और तुम्हारे पिता होने के नाते, जब मैंने इस सोच का गहराई से विश्लेषण किया, तो मुझे इसमें कुछ व्यावहारिक और घोर कमियाँ दिखाई दीं, जिन्हें मैंने इस बहस में तर्क सहित सामने रखा:
समानता का असली अर्थ: रूढ़िवादिता का अंत काम को पूरी तरह छोड़ देने में नहीं है। असली समानता तब है जब घर का बेटा और बेटी दोनों रसोई को अपनी साझा ज़िम्मेदारी समझें।
अंबानी जी का उदाहरण और अवसर लागत (Opportunity Cost): कुछ लोग तर्क देते हैं कि खाना बनाने में समय बर्बाद करने से अच्छा है कि वह समय पैसे कमाने में लगाया जाए। लेकिन पापा ने इसका खंडन करते हुए कहा कि इंसान कोई रोबोट नहीं है जो 24 घंटे सिर्फ पैसे कमाए। भारत के सबसे अमीर व्यक्ति भी रोज़मर्रा के बुनियादी मानवीय कार्यों के लिए समय निकालते हैं। घर का बुनियादी काम करना कई बार मानसिक शांति और थेरेपी का काम करता है।
पारंपरिक हुनर का पतन: जैसे एक बनिया के बच्चे को व्यापार की, या एक कुम्हार के बच्चे को मिट्टी की समझ विरासत में मिलती है, वैसे ही परिवार को बांधने और सहेजने की कला एक बहुमूल्य 'सांस्कृतिक पूंजी' है। इसे रूढ़िवादिता कहकर त्याग देना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।
पुरुषों का आर्थिक बोझ: यदि घरेलू काम महिलाओं के लिए एक बोझ है, तो पूरे परिवार को वित्तीय सुरक्षा देना और मंदी या संकट के समय अकेले डटे रहना आज भी पुरुषों के लिए एक बहुत बड़ी 'डिफ़ॉल्ट बेड़ी' है। यदि एक लड़का बाहर से पैसे भी कमाए और घर आकर सारा काम भी करे, और लड़की केवल अपने करियर में मग्न रहे, तो वह रिश्ता समानता का नहीं, बल्कि अन्याय का शिकार हो जाएगा।
3 तराजू का अंतिम पलड़ा: 'जीवन की अनिश्चितता' (The Ultimate Test)
इस पूरी चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण और पीक पॉइंट तब आया जब पापा ने एक यथार्थवादी सवाल उठाया: "इस बात की क्या गारंटी है कि हर बच्चा उस आर्थिक मुकाम पर पहुँच ही जाएगा जहाँ वह स्टाफ रख सके?"
यदि परिस्थितियां विपरीत रहीं और दोनों परिवारों की बेटियां कल को एक साधारण आमदनी पर रह गईं, तब क्या होगा? इस कसौटी पर दोनों सोच का परिणाम ऐसा निकला:
उस माँ की बेटी का स्थिति: चूँकि उसे बचपन से कुछ नहीं सिखाया गया और उसके पास स्टाफ रखने के पैसे भी नहीं होंगे, तो वह वास्तविक जीवन में पूरी तरह लाचार, असहाय और घोर निराशा (Depression) का शिकार हो जाएगी। उसका पूरा मॉडल फेल हो जाएगा।
दूसरी स्थिति: इस स्थिति मे यदि किसी कारणवश एक साधारण नौकरी पर भी वह लरकी रहती है, तो भी उसे कोई मलाल या लाचारी नहीं होगी। उसके पास 'लाइफ स्किल' का कवच होगा। वह सहजता से अपना घर भी संभालेगी और अपना करियर भी। वह परिस्थितियों की गुलाम नहीं होगी।
भाग - 3
यह भाग पूरी तरह से अनिका तुम्हारे लिए एक 'मार्गदर्शिका' के रूप में है, जिसे वह अपने जीवन के हर पड़ाव पर एक कंपास (Compass) की तरह इस्तेमाल कर सकेगी।
जीवन का 'मध्यम मार्ग' और पापा की सीख
बेटी, अनिका पहले दो भागों में तुमने जाना कि बाहर का समाज कैसा है और पापा ने समाज की अलग-अलग विचारधाराओं को कसौटी पर कसकर क्या निष्कर्ष निकाला है। अब इस अंतिम भाग में, मैं तुम्हें सीधे तुम्हारे जीवन का वह 'नक्शा और नियम' सौंप रहा हूँ, जो तुम्हें 21 वीं सदी की एक बेहद सफल, सशक्त और साथ ही एक अत्यंत संवेदनशील और खुशहाल महिला बनाएगा।
इन पाँच सूत्रों को हमेशा अपने जीवन का आधार बनाना:
1 आत्मनिर्भरता का असली पैमाना (True Self-Reliance)
अनिका, जब तुम बड़ी होगी, तो लोग तुम्हें सिखाएंगे कि बहुत सारे पैसे कमा लेना ही आत्मनिर्भरता है। लेकिन तुम्हारे पापा तुम्हें सिखा रहे हैं कि असली आत्मनिर्भरता केवल बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में खुद को संभाल लेने की क्षमता से आती है।
पापा की सीख: रसोई का काम, खाना बनाना या घर को व्यवस्थित रखना कोई 'जेंडर ड्यूटी' नहीं है, यह जीवित रहने की कला (Survival Skill) है। तुम्हें कॉर्पोरेट बोर्डरूम की फाइलों को संभालना भी बखूबी आना चाहिए और संकट के समय किचन में खुद के लिए दो रोटियां सेकना भी आना चाहिए। तुम्हारा हुनर ही तुम्हारी सबसे बड़ी ढाल है, ताकि तुम जीवन में कभी, किसी भी काम के लिए किसी दूसरे पर आश्रित न रहो।
2 हुनर को 'पावर' बनाना, 'बेड़ी' नहीं (Weaponize Your Skill, Don't Let it Chain You)
उस माँ का डर गलत नहीं था कि समाज लड़कियों के हुनर का फायदा उठाकर उन्हें किचन तक सीमित कर देता है। लेकिन उसका समाधान (काम न सीखना) गलत था। तुम्हें मध्यम मार्ग अपनाना है।
पापा की सीख: काम को पूरे दिल से सीखो, लेकिन अपनी मानसिक प्रोग्रामिंग इतनी मजबूत रखना कि यह काम तुम्हारी मजबूरी न बने। तुम्हारे भीतर इतनी हिम्मत और स्पष्टता होनी चाहिए कि तुम बिना किसी 'अपराध बोध' (Guilt) के अपने जीवनसाथी से कह सको—"काम हम दोनों बांटकर करेंगे या बाहर से प्रबंध करेंगे।" तुम्हें 'ना' (No) कहने की कला और अपने अधिकारों के लिए गरिमापूर्ण तरीके से खड़े होने का हुनर बचपन से ही सीखना होगा।
3 महत्वाकांक्षा और आर्थिक सर्वोच्चता (Aim for the Sky)
पापा तुम्हें सिर्फ एक साधारण नौकरी के लिए तैयार नहीं कर रहे हैं। पापा चाहते हैं कि तुम शिक्षा और करियर के जिस भी क्षेत्र को चुनो, वहाँ शिखर (Top) पर पहुँचो।
पापा की सीख: आर्थिक रूप से अत्यधिक सक्षम बनना बहुत ज़रूरी है। जब तुम करियर में बहुत ऊँचे मुकाम पर होगी, तो तुम्हारे पास 'विशेषाधिकार' (Privilege) होगा। तब तुम अपनी मर्जी और सहूलियत से घरेलू स्टाफ रख सकोगी। लेकिन अंतर यह होगा कि तुम किचन में तब नहीं जाओगी जब कोई तुम्हें 'मजबूर' करेगा; तुम किचन में तब जाओगी जब तुम्हारा 'मन' होगा या जब तुम अपने परिवार के प्रति प्रेम व्यक्त करना चाहोगी।
4 जीवनसाथी का चुनाव: सबसे महत्वपूर्ण फैसला
चूँकि तुम एक ऐसे घर में बड़ी हो रही हो जहाँ पापा और मम्मी मिलकर हर ज़िम्मेदारी निभाते हैं, तुम्हारे अवचेतन मन में एक आदर्श पुरुष की छवि बहुत ऊँची होगी। बाहर की दुनिया में ऐसे लड़के मिलना शायद थोड़ा मुश्किल हो, इसलिए तुम्हें बहुत सतर्क रहना होगा।
पापा की सीख: जब तुम बड़ी होकर अपने लिए जीवनसाथी चुनो, तो केवल उसका रूप-रंग, खानदान या उसका पैकेज (पैसा) मत देखना। यह देखना कि उसकी मानसिकता कैसी है। क्या वह महिलाओं का सम्मान करता है? क्या वह घर के कामों को 'छोटा' समझता है या उसे एक साझा ज़िम्मेदारी मानता है? एक ऐसा जीवनसाथी चुनना जो तुम्हारी उड़ानों में तुम्हारा पंख बने, न कि तुम्हारे पैरों की बेड़ी। इस बात की भी ध्यान रखना इंसान लंबे समय तक भी अपने चेहरे पर मुखौटा पहन सकता है तुमको यह पहचानना सीखना होगा की सामने वाला नैच्रल है या मुखौटा पहने हुए है।
5 स्वाभिमान और लचीलेपन का संतुलन (Self-Respect vs Adaptability)
एक शिक्षक की बेटी होने के नाते, तुम्हारा आत्मसम्मान हमेशा बहुत ऊँचा रहेगा और पापा को इस पर गर्व होगा। लेकिन जीवन को सुखद बनाने के लिए 'लचीलापन' भी उतना ही ज़रूरी है।
पापा की सीख: रिश्तों को खूबसूरत बनाए रखने के लिए कभी-कभी थोड़ा झुकना या सामंजस्य (Adjust) बिठाना कमज़ोरी नहीं, बल्कि बहुत बड़ी समझदारी और परिपक्वता होती है। लेकिन हमेशा याद रखना—जहाँ बात तुम्हारे आत्मसम्मान पर आए, जहाँ कोई तुम्हारे करियर को दबाने की कोशिश करे, या तुम्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करे, वहाँ तुम्हें 'लोहे की दीवार' बन जाना है। वहाँ झुकना गुनाह है।
अनिका के लिए पापा का अंतिम आशीर्वाद
मेरी प्यारी बेटी,
कल को तुम इतिहास रचो, अंतरिक्ष में जाओ, बड़ी कंपनी की मालकिन बनो या एक साधारण जीवन जियो—पापा का प्यार और गर्व तुम्हारे लिए हमेशा एक जैसा रहेगा।
पापा ने तुम्हें जो 'मध्यम मार्ग' सिखाया है, वह तुम्हें आसमान की ऊंचाइयों पर उड़ने के लिए पंख भी देगा और ज़मीन पर मजबूती से टिके रहने के लिए जड़ें भी देगा। तुम उस विद्रोही माँ की बेटी की तरह सिर्फ 'आर्थिक मशीन' बनकर नहीं जिओगी, बल्कि तुम एक संपूर्ण इंसान बनकर जिओगी, जिसके पास पैसा भी होगा, संस्कार भी होंगे, हुनर भी होगा और अपनों को समेटकर रखने का अगाध प्रेम भी होगा।
हमेशा खुश रहो, मेरी अनिका
तुम्हारे पापा
समाज के नाम एक खुला पत्र: बच्चों की परवरिश और हमारा दोहरा चरित्र
यह चौथा और अंतिम भाग मेरी बेटी अनिका के लिए तो है ही, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा यह उस समाज के लिए है जिसमें अनिका और हमारे देश के करोड़ों बच्चे बड़े हो रहे हैं। एक शिक्षक और एक पिता के रूप में, मैं आज समाज के उस आईने पर जमी धूल को साफ़ करना चाहता हूँ, जो हमारे बच्चों के वैवाहिक जीवन को नरक बना रहा है।
यदि हम चाहते हैं कि 21 वीं सदी के 2026 के इस दौर में हमारी आने वाली पीढ़ी का वैवाहिक जीवन टूटने से बचे और वे खुशहाल रहें, तो समाज को अपनी परवरिश के ढर्रे में तुरंत तीन बड़े बदलाव करने होंगे:
1 समाज का सबसे बड़ा दोहरा चरित्र : 'बेटे और दामाद' का चश्मा
हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ एक ही महिला या एक ही परिवार दो अलग-अलग चश्मों से दुनिया को देखता है:
दामाद के रूप में उम्मीद: जब किसी की बेटी ब्याह कर जाती है, तो हर माँ-बाप यह उम्मीद करते हैं कि उनका दामाद बहुत आधुनिक हो, उनकी बेटी की नौकरी का सम्मान करे और किचन व घर के कामों में हाथ बटाए ताकि उनकी बेटी थके नहीं।
बेटे के रूप में पाखंड: लेकिन वही माँ जब अपने घर में बैठी होती है, तो वह अपने बेटे को पानी का ग्लास उठाने की ज़हमत भी नहीं देना चाहती। जैसे ही उसका बेटा किचन में अपनी पत्नी की मदद करने जाता है, माँ के भीतर का पारंपरिक अहंकार जाग जाता है और वह इसे अपनी बहू की 'नाकामी' या बेटे का 'जोरू का गुलाम' होना मान लेती है।
जब तक समाज में "जो मेरे दामाद से अपेक्षित है, वही मेरे बेटे का भी कर्तव्य है" की सोच पैदा नहीं होगी, तब तक हम एक स्वस्थ समाज का निर्माण नहीं कर सकते।
2 जेंडर-न्यूट्रल परवरिश: बेटा हो या बेटी, किचन सबके लिए है
प्रकृति ने स्त्री और पुरुष के जैविक कार्य (Biological roles) तय किए हैं, लेकिन समाज ने घरेलू कार्यों को 'औरतों का काम' बताकर जो विभाजन किया, वह घोर अन्याय है।
पापा का समाज को संदेश: यदि मेरा बेटा होता, तो मैं उसे भी ठीक उसी तरह किचन में ले जाता और सारे काम सिखाता जैसे मैं अपनी बेटी अनिका को सिखाऊँगा। खाना बनाना, कपड़े धोना या सफाई करना कोई 'स्त्री-धर्म' नहीं है; यह 'मानव-धर्म' है, जीवित रहने का हुनर (Survival Skill) है।
जब हम अपने बेटों को यह सिखाकर बड़ा करेंगे कि घर का काम करना तुम्हारी मर्दानगी को कम नहीं बल्कि पुख्ता करता है, तब जाकर शादियों के बाद 'द सेकंड शिफ्ट' का वह अदृश्य बोझ लड़कियों के कंधों से हटेगा, जो आज कई न्यूक्लियर परिवारों के टूटने की मुख्य वजह बन रहा है।
3 'प्राइवेट स्पेस' का सम्मान और मानसिक आज़ादी
आज के न्यूक्लियर और सिंगल परिवारों के दौर में, जब बच्चे काम के सिलसिले में माता-पिता से दूर अपने स्वतंत्र घर बसा रहे हैं, तब भी समाज और रिश्तेदारों का रिमोट कंट्रोल उनके किचन पर होता है।
समाज को सीख: यदि कोई पति और पत्नी आपसी समझदारी से यह तय करते हैं कि पति खाना बनाएगा और पत्नी आर्थिक मोर्चे संभालेगी, या दोनों मिलकर काम करेंगे, तो समाज को उनके इस 'निजी तालमेल' (Adjustments) में टांग अड़ाना बंद करना होगा। समाज की टोका-टाकी और 'लोग क्या कहेंगे' का डर ही बच्चों के मन में हीनभावना या आक्रोश पैदा करता है।
4 आर्थिक और घरेलू ज़िम्मेदारियों का न्यायपूर्ण संतुलन
21 वीं सदी में हम अपनी बेटियों को खूब पढ़ा-लिखा रहे हैं, वे अर्निंग हैंड (Earning Hand) बन रही हैं। लेकिन समाज पुरुषों पर से वह 'डिफ़ॉल्ट प्रोवाइडर' (हमेशा कमाते रहने का बोझ) का दबाव नहीं हटा पाया है और महिलाओं पर से किचन का डिफ़ॉल्ट बोझ नहीं हटा पाया है।
परवरिश का नया नियम: हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि यदि पत्नी बाहर जाकर आर्थिक सहयोग दे रही है, तो पुरुष का किचन में आना कोई एहसान नहीं है। और यदि पुरुष पूरे घर की वित्तीय सुरक्षा का अंतिम बोझ उठा रहा है, तो महिला का परिवार को अपनी स्वाभाविक निपुणता से सहेजना उसकी गुलामी नहीं है। यह एक 'साझा व्यापार' (Partnership) है, जहाँ दोनों को बराबर का पसीना बहाना होगा।